aurat

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शनिवार, 20 मार्च 2010

मेरे अन्दर......

मेरे अन्दर जलता है एहसासों का लावा क्यूँ
जिंदा हु पर जीती नहीं
जीवन का यह छलावा क्यूँ
कहते हैं सब "बेटी" मुझको
फिर भी रिश्ता पराया क्यूँ
बराबरी जब दे नहीं सकते
फिर मुझको यूँ जाया क्यूँ
मुझको यूँ समझा जाता है
होनी का कराया क्यूँ
बेटी भी एक जीवन है
उसके जनम को समझो तुम
वो भी उर्दना चाहती है
उसके पर न कतरों तुम
वो भी पढना चाहती है
उसकी मेधा समझो तुम
है हक खुशियों पर उसका भी
यूँ न इस हक को चीनो तुम
मेरे अनदर जलता है एहसासों का लावा क्यूँ..

7 टिप्‍पणियां:

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  2. Pratiksha khushiyon ki pratiksha nahi kintu khushiyan iski pratiksha kar raha hai.
    I saw in her every shades of an ideal woman and she has become the most imporatant woman in my life. May god shower all his blessings on her :)

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  3. kushiya chahat ki ceej nai hai,ase to jitna thoker marogi utni hi yumhare pass ayangi.lekhika to khud kusiyo ka bhandar hai use is sub ke pechey bhagna hi nahi chahia.tum khushiyo se nahi sagti bulki khushiya tumse sajti hai.it is truth as death

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  4. आपने बहुत सही लिखा है। हम केवल कपड़ों से मार्डन हुए है। अभी कोर्ट के एक फैसले में भी महिलाओं के सरनेम को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हुआ था। बदलते दौर में महिलाओं को अभी लंबा रास्ता तय करना है। अच्छे लेख के लिए बधाई....

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  5. excellent writing. whenever you go to poetry from prose, I am short of words to appreciate. This is your strength. its truly thrilling reading your poems.
    Keep it up.. and next time i want some happy poem :-)

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  6. great deed pratiksha di...ye kaam sirf aap hi kar sakti ho...proud of u...nd m wid u alwys...koi seh leta hai,koi keh leta bt u r da only one who do it

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  7. v.good, right way of your energy.Keep it up..
    wait for your next cereative step.

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