मेरे अन्दर जलता है एहसासों का लावा क्यूँ
जिंदा हु पर जीती नहीं
जीवन का यह छलावा क्यूँ
कहते हैं सब "बेटी" मुझको
फिर भी रिश्ता पराया क्यूँ
बराबरी जब दे नहीं सकते
फिर मुझको यूँ जाया क्यूँ
मुझको यूँ समझा जाता है
होनी का कराया क्यूँ
बेटी भी एक जीवन है
उसके जनम को समझो तुम
वो भी उर्दना चाहती है
उसके पर न कतरों तुम
वो भी पढना चाहती है
उसकी मेधा समझो तुम
है हक खुशियों पर उसका भी
यूँ न इस हक को चीनो तुम
मेरे अनदर जलता है एहसासों का लावा क्यूँ..
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शनिवार, 20 मार्च 2010
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